Friday, December 16, 2011

सोशल मीडिया पर निगरानी बनाम साज़िश-ए-सरकार

पीयूष पांडे, साइबर पत्रकार

दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया पर नकेल कसने के अपने इरादे जाहिर ही किए कि इंटरनेट पर उनके खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। यह लाज़िमी था। लेकिन, सिब्बल के बयान के फौरन बाद अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने भी जिस तरह भारत पर निशाना साधा, वह चिंता का विषय है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार दिवस पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने भारत और कपिल सिब्बल का नाम लिए बगैर कहा कि वे दिन गए जब अहंकारी सरकारें सूचनाओं के प्रवाह को रोक सकती थीं। आज लोगों व संस्थाओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए आलोचनाओं व सार्वजनिक बहस से बचने के लिए सरकार को इंटरनेट और सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर रोक नहीं लगानी चाहिए। मून के बयान से महज दो दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भी सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की कथित कोशिशों को लेकर भारत पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था, जब विचारों को ब्लॉक किया जाता है, सूचनाओं को डिलीट किया जाता है,बातचीत को दबाया जाता है और लोगों को विकल्पों में सीमित किया जाता है तो इंटरनेट हम सभी के लिए कमजोर हो जाता है।

इंटरनेट पर आपत्तिजनक कंटेंट की भरमार होने के बावजूद कपिल सिब्बल की सोशल मीडिया पर पाबंदी की कथित कोशिशों को लेकर जबरदस्त हल्ला मचा है तो इसीलिए क्योंकि वह तर्कहीन हैं। सूचना तकनीक कानूनों को सख्त बनाए जाने के बाद आपत्तिजनक कंटेंट प्रसारित करने वाले के खिलाफ कार्रवाई संभव है। खास बात यह है कि इस मुद्दे पर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने भारत को आइना दिखाने की कोशिश की है, लेकिन वे भूल गए कि पहले उन्हें अपने घर में झांकने की जरुरत है। कम से कम अमेरिका को। विकीलीक्स का उदाहरण हमारे सामने है, जिसे अमेरिका पूरी रणनीति के साथ बंद करने में लगा है। अमेरिका ने विकीलीक्स को आर्थिक मदद प्राप्त करने में सहायता करने वाली वीजा, मास्टरकार्ड आदि कंपनियों को साइट से संबंध तोड़ने के लिए बाध्य किया। ट्विटर पर विकीलीक्स से जुड़े लिंक्स की प्राथमिकता को कम कराया। सूचनाओं के मुक्त प्रवाह की हिमायती हिलेरी क्लिंटन के विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर काम करने वाले छात्रों को चेताया कि वे विकीलीक्स के केबल को न तो पढ़ें, न लिंक करें और न ही उन पर चर्चा करें। व्हाइट हाउस ने सरकारी कर्मचारियों को चेताया कि विकीलीक्स द्वारा लीक केबल अभी भी गोपनीय दस्तावेज की श्रेणी में हैं और तमाम अखबारों के प्रकाशित करने के बावजूद वे उन्हें न देखें वरना इसे कानून का उल्लंघन माना जाएगा। इसके बाद ओबामा प्रशासन ने लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस समेत कई संस्थानों में इन दस्तावेजों को ब्लॉक कर दिया। विकीलीक्स प्रकरण के बाद ओबामा प्रशासन एक नए संघीय कानून पर काम कर रहा है, जिसके तहत ई-मेल, इंस्टेंट मैसेजिंग और दूसरे संचार तकनीक प्रदानकर्ताओं को कानूनी एजेंसियों के चाहने मात्र से सारा डाटा दिखाना होगा। उन्हें एक साल तक अपने ग्राहकों का सारा डाटा सुरक्षित रखना होगा।

इसी तरह संयुक्त राष्ट्र को भी देखना होगा कि अभी 40 से ज्यादा देशों में इंटरनेट पर किसी न किसी तरह की पाबंदी है और वहां सूचनाओं को फिल्टर किया जाता है। क्यूबा, थाइलैंड,इरान,उत्तर कोरिया जैसे देशों में इंटरनेट सेंसरशिप का हाल यह है कि सामान्य जन लिखने से पहल कई बार सोचता है कि कहीं उसका लिखा उसे जेल न पहुंचा दे। चीन में तो यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर जैसी साइटों पर पूर्ण पाबंदी है ही, और चीन की अपनी एक अलग अदद इंटरनेट दुनिया है।

अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र पहले इन देशों को इंटरनेट सेंसरशिप से मुक्त कराएं, फिर भारत के बारे में बयानबाजी करें। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में लोगों की आवाज को दबाना मुश्किल है। प्रख्यात पत्रकार एमजे अकबर ने अपने एक लेख में कहा भी, चाय की दुकानों पर आप सेंसरशिप कैसे लगाओगे?

दरअसल, भारत में अभिव्यक्ति की मुखरता के बीच सेंसरशिप की आहट भी लोगों को न केवल बेचैन कर देती है बल्कि उनके क्रोधित भी कर डालती है। जहां तक भारत का सवाल है तो सिब्बल ने सही समस्या का गलत तरीके समाधान निकालने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कंटेंट की भरमार है। आपत्तिजनकसामग्री भी सापेक्षिक है यानी कोई सामग्री अगर भारत में आपत्तिजनक कंटेंट की श्रेणी में है तो आवश्यक नहीं कि वो अमेरिका में आपत्तिजनक कंटेंट कहलाए। सोशल नेटवर्किंग साइट्स का भी तर्क है कि वे अमेरिकी कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य हैं, न कि भारतीय कानूनों का। सोशल नेटवर्किंग साइट्स कंपनियों के मुताबिक कपिल सिब्बल चाहते थे कि भारतीय उपयोक्ताओं के कंटेंट को सार्वजनिक करने से पूर्व पूर्वपरीक्षण की कोई प्रणाली विकसित की जाए। तकनीकी रुप से यह आसान नहीं है। भारत में अभी फेसबुक के करीब चार करोड़ बीस लाख ज्यादा उपयोक्ता हैं तो उनके कंटेंट को मॉडरेट करना लगभग नामुमकिन है। भारत के संदर्भ में यह मांग मानी जाती तो जल्द अन्य देशों की सरकारों की तरफ से भी इस तरह की मांग उठती। दरअसल, सिब्बल के इरादे इंटरनेट सेंसरशिप की तरफ ले जाते हैं, जिसे किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इस दौरान जस्टिस काटजू जैसी हस्तियां इस मामले को और हवा देती हैं। लेकिन,उन्हें यह समझ लेना होगा कि भारत में इंटरनेट पर पूर्ण पाबंदी संभव नहीं है। अलबत्ता इसका उल्टा असर यानी स्ट्रीजएंड अफेक्ट जरुर राजनेताओं को देखने को मिल सकता है, जहां लोग छद्म प्रोफाइल से, विदेशों में बसे अपने मित्रों की मदद से और सोशल नेटवर्किंग की सबसे बड़ी ताकत यानी एक लाइक या शेयर के जरिए बात का प्रचार कर सरकार की ऐसी-तैसी करने में जुट सकते हैं।

वैसे, यह भी अजीब संयोग है कि कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया पर नकेल कसने का इरादा उस वक्त जाहिर किया है, जिस वक्त समाजसेवी अन्ना हजारे फिर सशक्त लोकपाल के मसले पर आंदोलन करने को तैयार दिख रहे हैं। सरकार महंगाई को लेकर कठघरे में है और उसका हर दांव उसी पर भारी पड़ रहा है। सरकार विरोधी माहौल सोशल मीडिया पर तेजी से तैयार होता है, और इसका अंदाज सरकार को अन्ना आंदोलन के पहले चरण से है। सरकार खुद मान चुकी है कि उसे इस बात का इल्म नहीं था कि सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ गुस्सा पनप रहा था। वह इसे भांपने में नाकाम रही।

दरअसल,सोशल मीडिया से जुड़ी समस्याओं को दरकिनार नहीं किया जा सकता। आपत्तिजनक कंटेंट भी इनमें से एक बड़ी समस्या है। लेकिन, इसका हल सोशल मीडिया पर किसी भी तरह की पाबंदी के रुप में नहीं खोजा जा सकता। इंटरनेट पर एक नयी संस्कृति विकसित हुई है। पूरी दुनिया में। संस्कृति एक पैकेज की शक्ल में आती है, जिसे कई सकारात्मक पहलू होते हैं तो कुछ नकारात्मक भी। तो जरुरी यह है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर पसरी समस्याओं को हल सार्थक तरीके से खोजने की कोशिश की जाए। लोगों को इन समस्याओं का हल खोजने में भागीदार बनाया जाए।